विवेकानंद जी द्वारा रचित उनके सन्यासी जीवन का भजन --
मत जोड़ो तुम ग्रह और द्वार
समा सको तुम कहां आवास
दुर्बादल हो तुम्हारा तपल तुम्हारा
ग्रह बितान आकाश
हरि ॐ तत्सत ह्री ॐ तत्सत
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