“सफलता पाई अथवा नहीं, उन्हें क्या ज्ञात? दे चुके प्राण!
विश्व को चाहिए उच्च विचार? नहीं, केवल अपना बलिदान।”
जब भी मैं श्रद्धेया अम्मा (राजमाता विजयाराजे सिंधिया) के बारे में सोचती हूं, मुझे माखन लाल जी कि ये पंक्तियां याद आ जाती हैं। दुनिया में “उच्च विचारों” की कमी नहीं है। बहुत से लोग बहुत ऊंचा सोचते हैं लेकिन जब त्याग और कर्म की घड़ी आती है तो उनका इतिहास में कहीं कोई नाम नहीं होता। अयोध्या का भव्य राम मंदिर इस बात का गवाह है कि राजमाता ने कैसे अपने विचार, संकल्प और त्याग की पूंजी से उसकी आधारशिला को सींचा था।
जब से मैंने होश संभाला, राजमहल की दीवारों के भीतर और उससे बाहर की दुनिया को जानने-समझने लगी, अम्मा के प्रति मेरा स्नेह बढ़ता ही गया। मैंने देखा कि एक ओर वे राजमहल की गरिमा और मर्यादा का सदैव सम्मान करती रहीं और दूसरी ओर जब लोक दायित्वों के कारण जनता और जनजीवन से उनका सम्बंध जुड़ा तो वे उनके बीच वैसे ही घुल-मिल गईं जैसे पानी में नमक। व्यक्तित्व का यह अद्भुत संतुलन था उनमें जिसने छुटपन से ही मुझे प्रेरित किया और मैं उन्हीं की तरह बनने की चेष्टा करने लगी। इस चेष्टा में मैं कितना सफल हुई इसका आकलन तो शायद वे लोग ही कर सकते हैं जिनकी सेवा का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ।
वे ज्यादातर चुप रहती थीं लेकिन उनके मौन में जो अपार धैर्य छिपा था उसका आभास मुझे आपातकाल (इमर्जेंसी) के दौरान हुआ। आपातकाल का दौर उनके जीवन का ऐसा अध्याय था, जिसने मुझे लोकतंत्र और स्वतंत्रता का महत्व बहुत करीब से समझाया। उस कठिन समय में उनका साहस और संघर्ष मेरे लिए हमेशा प्रेरणा रहा। भारतीय जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी तक की उनकी यात्रा भी राष्ट्रसेवा और विचारों के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता की कहानी है।
अम्मा मेरे लिए सिर्फ माँ नहीं, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी शिक्षिका थीं। उनमें मैंने भगवान श्रीकृष्ण द्वारा ‘गीता’ के दूसरे अध्याय के 70वें श्लोक में कही गई इस बात को चरितार्थ होते देखा कि जैसे समुद्र अनेक नदियों को अपने में समेट कर भी कभी विचलित और अमर्यादित नहीं होता, वैसा ही हम सबको होना चाहिए। उनसे मैंने सीखा कि परिस्थितियों का उलटफेर चाहे कुछ भी हो, हमें न्याय और आदर्श पर दृढ़ रहना चाहिए।
लेकिन उनमें दृढ़ता के साथ अपार ममता भी थी। वे हर व्यक्ति की बात ध्यान से सुनतीं और समाज के अंतिम व्यक्ति के प्रति भी उतनी ही संवेदनशील रहती थीं। आज जीवन के किसी भी कठिन मोड़ पर निर्णय लेते समय उनकी सीख याद आती है—सही रास्ते पर डटे रहो, ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाओ और हर व्यक्ति का सम्मान करो।
मेरे लिए राजमाता के जीवन की यही सबसे अनमोल विरासत है।
आज आपकी जयंती पर हृदय की गहराइयों से नमन। आपका आशीर्वाद मेरे सिर पर बना रहे।
यशोधरा राजे सिंधिया












































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