ग्वालियर। संतश्री गोपाल दास महाराज ने कथा का श्रवण कराते हुए कहा कि अमर्यादित आचरण जीवन में दुःख-भोग का कारण बनता है। इसलिए जरूरी है कि जीवन मर्यादित हो। क्योंकि मर्यादित जीवन ही परिवार, समाज व राष्ट्र को दिशा देता है। भगवान श्रीराम तो अपने आचरण और व्यवहार से मर्यादा पुरुषोत्तम बन गए।
संतश्री ने कहा कि भगवान का नाम-जाप करने वाले का कभी कोई अहित नहीं होता है। भगवत जाप से सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है। प्रभु नाम-जाप से जीवन में पवित्रता आती है। इसलिए जरूरी हो जाता है कि पवित्र भाव से अहंकार मुक्त जीवन जीना चाहिए। जब जीव के मन में अहंकार आ जाता है तो फिर समस्याएं जन्म लेने लगती हैं।
उन्होंने भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण और जगत के पालनहार श्रीहरि के प्रसंगों का वर्णन करते हुए कहा लोग कहते हैं कि भगवान श्रीराम से श्रीकृष्ण बड़े हैं क्योंकि वे सौलह कलाओं के ज्ञाता है। लेकिन लोगों का यह भ्रम है। भगवान श्रीराम 12 कलाओं और श्रीकृष्ण को 16 कलाओं को जानकार माना जाता है। उसके पीछे भी महत्वूर्ण कारण है कि श्रीराम सूर्यवंश से हैं और श्रीकृष्ण चंद्रवंशी। सूर्य वंश में 12 और चंद्रवंश में 16भ् भाव हैं। ऐसे में प्रभु को किसी एक-दूसरे से कमतर आंकना मानव भूल है। भगवान तो स्वयं कहते हैं मैं तो मर्यादा में ही रहकर जीवन व्यतीत करता हॅूं। ऐसे में इंसान के लिए भी जरूरी हो जाता है कि वह अहंकार मुक्त होकर परोपकारी भाव के साथ मर्यादित जीवन का ही पालन करे।





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