नगर बन गया नर्क है
और पालिका स्वर्ग।
जनता के दुःख दर्द से
नहीं किसी को फर्क।।
करोड़ों की हैं योजनाएं
खूब मच रही लूट।
अंधा बांटे रेवड़ी,
मजे कर रहे पूत ।।
गायत्री को सबने
सावित्री सा माना
सौंप दिया था उसको
नगर का ताना बाना।।
गायत्री पर,गाय बन गई
खा गई सारा चारा।
पार्षदों का झुंड
चिल्लाता बेचारा।।
त्याग पत्र ले घूम रहें हैं
कोई न उनकी सुनता।
प्रजातंत्र के चक्कर में
कलेक्टर भी सिर धुनता
फाइलों का पता नहीं
कहां हो गई लुप्त।
छिप छिप बाबू बोल रहे
है मामला गुप्त।।
ठेकेदार के पीछे
पुलिस घूम रही है,
गोद में है मोड़ा,
बस्ती में ढूंढ रही है ।।
तीन अफसर निलम्बित,
अब अध्यक्ष की बारी।
जनता भी ताक रही है
कब गिरेगी आरी।।
शिवपुरी का भाग्य है
बहुत बड़ा दुर्भाग्य।
सड़क, सीवर, सिंधु का
मिला नहीं सौभाग्य।।
साल पंद्रह बीत चुके
योजनाएं नाकाम।
खर्च करोड़ों हो गए
पहुंची नहीं मुकाम।।
भ्रष्ट्राचार हजम की
कोई तो हद होगी।
करोड़ों खा गए नोट
पर,बना न कोई रोगी।।
देख हाजमा इनका
डॉक्टर भी चकराए।
पाचन शक्ति नेता अफसर
हैं कहां से लाए।।
लोकतंत्र में लगता
भ्रष्टों का इलाज नहीं है
कितनी कर लो जांचें
फंसता कोई नहीं है ।।
*डॉ आरके जैन शिवपुरी*













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