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#धमाका_डिफरेंट_खबर: वीभत्स रस में डूबी हुई सिनेमा, जहाँ नृशंसता ही पटकथा है, फिल्म 'धुरंधरः द रिवेंज' की सेकेंड रिलीज, पहले दिन दुनियाभर में 237 करोड़ रुपए कमाए

शनिवार, 21 मार्च 2026

/ by Vipin Shukla Mama
फिल्म 'धुरंधरः द रिवेंज' की सेकेंड रिलीज बॉक्स ऑफिस की धुरंधर साबित होती जा रही है। फिल्म ने पहले दिन दुनियाभर में 237 करोड़ रुपए कमाए। इससे पहले कोई भी हिंदी फिल्म पहले दिन 200 करोड़ के पार नहीं गई थी। जवान (2023) ने दुनियाभर में पहले दिन 150 करोड़ रुपए कमाए थे।
धुरंधर भारत में पेड प्रीव्यू के साथ 2 दिन में 220 करोड़ रु. के कारोबार तक पहुंच सकती है। गुरुवार को फिल्म ने 103 करोड़ रुपए कमाए। शुक्रवार देर शाम तक कलेक्शन करीब 75 करोड़ रुपए तक था। ट्रेड पोर्टल सेकनिल्क के अनुसार 'धुरंधर' को पहले वीकेंड के लिए 300 करोड़ रु. की एडवांस बुकिंग मिली है। ऐसे में रविवार तक 400 करोड़ का कारोबार संभव है। अभी तक 354 करोड़ रु. के साथ 'पुष्पा-2 द रूल' (2024) के नाम पहले वीकेंड पर सर्वाधिक कमाई
का रिकॉर्ड है। दर्शकों की मिली जुली प्रतिक्रिया सामने आई है उनका कहना है कि 
वीभत्स रस में डूबी हुई सिनेमा, जहाँ नृशंसता ही पटकथा है, परिस्थितजन्य हास्य का पुट उसका ऑक्सीजन है, बीच-बीच में बजते 90s के गीत पटकथा में मादकता भरते हैं और भगिनी-प्रेम की अग्नि में जला एक युवक नायक है। जिसके अगले जीवन की पटकथा दिल्ली में बैठा अजय सान्याल लिख रहा है।
यह सिनेमा सिर्फ़ और सिर्फ़ आदित्य धर के जसकिरत सिंह रंगी का फ़्लैशबैक है। अगर यह पर्दे के बजाय वेबसीरिज बन के आती तो कम से कम पाँच छह सीजन का मटेरियल तो इन्ही दोनों पार्ट में है। अत्यंत ही नाज़ुक पलों में अचानक बैकड्रॉप में म्यूजिक का बंद हो जाना, लगे हुए ध्यान को और ईंटेंस करता है। इस पार्ट के साथ आदित्य धर बॉलीवुड के प्रयोगधर्मी निर्देशक तौर पर भी जाने जाएँगे।एक शानदार प्रयोग यह है कि एक समय में वो कई हिंसक दृश्यों को सिमलेटेन्युओसली कॉनक्ल्यूड करते हैं, जो देखने में रोमांच पैदा करता है। साहस तो उनमें है ही, बायस्ड विचार भले इसे प्रोपगंडा माने,  मगर ISI के एक मेजर के दिमाग में जिस तरह का उन्मादी कीड़ा पल रहा है, उसे पर्दे पर बुलवा लेना ऐतिहासिक है। कम से कम भारतीय इलीट विमर्श में तो ऐतिहासिक ही है। 
थोड़ी सरकार की अनियंत्रित प्रशंसा भी है , मगर वो जबरन ठूँसी ही नहीं है मास जैसा सोचता है उसका रिफ्लेक्शन है। स्टोरी लाइन थोड़ी और गहरी बुनी जा सकती थी। मगर 4 घंटे का रनटाइम देखकर यह सलाह नहीं दी जा सकती कि निर्देशक कहाँ जोड़े और कहाँ घटाए। 
कुल-मिलकर बेजोड़ फ़िल्म है। दो बार सिनेमा हॉल में देखने योग्य। इसके देखने का दूसरा फ़ायदा यह भी है कि रील युग में यह लोगों का अटेंशन स्पेन सही कर देती है। हां परिवार के साथ जाएं तो याद रखियेगा अभद्र भाषा या कहिये गालियों की फेहरिस्त आपको शर्मिंदा कर सकती है, कुछ दर्शकों का कहना है कि इनकी मौजूदगी खलती है जबकि इनके बगैर भी काम चल सकता था। इसी तरह कुछ अहिंसक भारतीय हिंसा से भरे सीन देखकर फिल्म से तौबा भी कर रहे हैं उन्होंने पार्ट वन और अब पार्ट टू भी देखने से इंकार किया है।













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