करैरा। नगर के मुंशी प्रेमचंद कॉलोनी स्थित वरिष्ठ साहित्यकार सतीश श्रीवास्तव के निवास पर उनके सुपुत्र चि. सचिन श्रीवास्तव एवं नाती चि. अयान श्रीवास्तव के जन्मदिन के अवसर पर एक भव्य एवं गरिमामयी कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में क्षेत्र के ख्याति प्राप्त कवियों और साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से वातावरण को काव्यमय बना दिया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ गीतकार एवं साहित्यकार घनश्यामदास योगी ने की, जबकि मुख्य अतिथि के रूप में समाजसेवी सुरेश बंधु उपस्थित रहे। विशिष्ट अतिथि के रूप में वरिष्ठ पत्रकार युगल किशोर शर्मा एवं एम.के. अकादमी महुअर कॉलोनी के संचालक मुकेश प्रजापति की गरिमामयी उपस्थिति रही।
कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती के पूजन के साथ हुआ। इसके पश्चात कवि गोष्ठी का क्रम प्रारंभ हुआ, जिसमें सर्वप्रथम गीतकार प्रतीक चौहान ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत कर माहौल को आध्यात्मिकता से ओतप्रोत कर दिया—
“मैया मन देवालय कर दो,
प्राणों की सुचिता बनी रहे,
वाणी में कविता बनी रहे,
अंतर्मन की गहराई में
भावों की सरिता बनी रहे,
बह निकले गीतों की गंगा,
मेरी कलम हिमालय कर दो।”
इसके पश्चात प्रमोद गुप्ता भारती ने भावपूर्ण रचना सुनाई—
“माँ की गोदी में बाल रूप
यौवन के संग खेली है,
वृद्धापन की तन्हाई में
कविता सखी सहेली है।”
प्रभुदयाल शर्मा ‘राष्ट्रवादी’ ने जोशीली कविता से श्रोताओं में ऊर्जा का संचार किया—
“सब एक साथ संकल्प करो,
हम हिन्दू राष्ट्र बनायेंगे।”
डॉ. ओमप्रकाश दुबे ने अपनी विशिष्ट शैली में व्यंग्यात्मक प्रस्तुति दी—
“कौन कहता है तुम्हारा
साधु का स्वभाव,
तुम्हारे व्यवहार में है
क्रोध का प्रभाव।”
इसके बाद प्रतीक चौहान ने अपनी एक और रचना से खूब सराहना बटोरी—
“हाथ दोनों पसारे चले आए हम,
द्वार सीधे तुम्हारे चले आए हम,
चित्त को शांति की चाह थी इसलिए,
आज महुअर किनारे चले आए हम।”
करैरा के प्रसिद्ध होम्योपैथी चिकित्सक डॉ. राजेन्द्र गुप्ता ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की—
“माँ शारदे... माँ शारदे,
अज्ञान तम पसरा यहाँ,
माँ ज्ञान रश्मि प्रसार दे,
माँ शारदे।”
साहित्यकार सतीश श्रीवास्तव ने पारिवारिक भावनाओं को व्यक्त करती रचना सुनाई—
“सुबह-सुबह जब हो जाती है
सब बच्चों से बात,
लगता है सचमुच मिल जाती
एक नई सौगात।”
वरिष्ठ पत्रकार युगल किशोर शर्मा ने प्रकृति और नवचेतना पर आधारित कविता प्रस्तुत की—
“गूँज उठा है नव-विहान, अम्बर ने राग सुनाया है,
ऋतुराज बसंत की आहट ने, कण-कण को आज सजाया है।”
नवोदित साहित्यकार जीशान बेग मिर्जा ने भी प्रभावी प्रस्तुति दी—
“इंसान इस कदर मगरूर हो गया है,
अपने मालिक एक हकीकी से दूर हो गया है।”
कवि बलराम धाकड़ ने शृंगार रस की सुंदर अभिव्यक्ति की—
“उसका दिल धड़केगा अब मेरे जिगर में,
आएगी वो जब भी मेरे ही शहर में।”
वरिष्ठ साहित्यकार वेदप्रकाश दुबे ने वैश्विक पीड़ा को स्वर दिया—
“माँ गोद में बालक लेकर
मरघट को जाती है,
रोती और बिलखती है।”
गोष्ठी के मुख्य आकर्षण सुभाष पाठक ‘जिया’ रहे, जिनकी प्रस्तुति पर सभागार तालियों से गूंज उठा—
“इश्क़ अच्छा है फकत ख्वाबों ख्यालों के लिए,
दिल जलाना पड़ता है यारों उजालों के लिए।
वो लिए बैसाखियाँ चढ़ता गया सब चोटियाँ,
और क्या शर्मिंदगी हो पांव वालों के लिए।”
सौरभ तिवारी ‘सरस’ ने अपने मुक्तकों से समां बांधा, वहीं अध्यक्ष घनश्यामदास योगी ने अपने नवसृजित दोहों से कार्यक्रम को ऊंचाई प्रदान की।
मुख्य अतिथि सुरेश बंधु ने अपने उद्बोधन में ऐसी साहित्यिक गोष्ठियों को समाज के लिए अत्यंत उपयोगी बताते हुए आयोजकों की सराहना की।
कार्यक्रम में प्रदीप कुमार शर्मा (आईटीबीपी), कु. श्रुति सिंह, चित्रांश शर्मा, आलोक चतुर्वेदी एवं देवांश शर्मा सहित अन्य प्रतिभागियों ने भी काव्य पाठ किया।
कार्यक्रम का सफल संचालन प्रमोद गुप्ता भारती ने किया, जबकि आभार प्रदर्शन सतीश श्रीवास्तव द्वारा व्यक्त किया गया। बड़ी संख्या में उपस्थित श्रोताओं ने पूरे आयोजन का भरपूर आनंद लिया।













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