शिवपुरी। न्यायालय के एक आदेश ने केवल एक अभियुक्त को जमानत नहीं दी, बल्कि एक चार माह की मासूम बच्ची को अपने पिता से मिलने की उम्मीद भी लौटा दी है।
विशेष न्यायालय द्वारा पुष्पेन्द्र चौहान को जमानत प्रदान किए जाने के बाद यह मामला पूरे जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है। बचाव पक्ष का कहना है कि यह केवल एक कानूनी लड़ाई नहीं थी, बल्कि एक ऐसे पिता की पीड़ा की लड़ाई थी जो अपनी नवजात बेटी से दूर था और लगातार उसे देखने की आस में जी रहा था।
बताया जाता है कि पुष्पेन्द्र चौहान और युवती के संबंधों से एक पुत्री का जन्म हुआ था, जो अभी मात्र चार माह की है। पिता होने के नाते वह अपनी बेटी के भविष्य, सुरक्षा और उससे मिलने के अधिकार को लेकर लगातार चिंतित था। यही कारण था कि उसने पूर्व में पुलिस अधीक्षक को भी आवेदन देकर अपनी पीड़ा व्यक्त की थी। एक पिता के लिए अपनी गोद में खेलने वाली बेटी से दूर रहना किसी सजा से कम नहीं होता।
जमानत सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष की अधिवक्ता रितु शर्मा ने केवल कानूनी प्रावधानों पर ही नहीं, बल्कि मामले के मानवीय पक्ष को भी मजबूती से न्यायालय के समक्ष रखा। उन्होंने अभिलेखों, न्यायालयीन कथनों और प्रकरण की वास्तविक परिस्थितियों का गहन अध्ययन कर न्यायालय को यह समझाने का प्रयास किया कि हर आरोप के पीछे एक मानवीय कहानी भी होती है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। एक पुत्री का जन्म हुआ था, जो अभी मात्र चार माह की है। पिता होने के नाते वह अपनी बेटी के भविष्य, सुरक्षा और उससे मिलने के अधिकार को लेकर लगातार चिंतित था। यही कारण था कि उसने पूर्व में पुलिस अधीक्षक को भी आवेदन देकर अपनी पीड़ा व्यक्त की थी। एक पिता के लिए अपनी गोद में खेलने वाली बेटी से दूर रहना किसी सजा से कम नहीं होता।
जमानत सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष की अधिवक्ता रितु शर्मा ने केवल कानूनी प्रावधानों पर ही नहीं, बल्कि मामले के मानवीय पक्ष को भी मजबूती से न्यायालय के समक्ष रखा। उन्होंने अभिलेखों, न्यायालयीन कथनों और प्रकरण की वास्तविक परिस्थितियों का गहन अध्ययन कर न्यायालय को यह समझाने का प्रयास किया कि हर आरोप के पीछे एक मानवीय कहानी भी होती है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।
कहा जाता है कि कई रातों तक फाइलों के बीच बैठकर की गई तैयारी, प्रत्येक दस्तावेज का सूक्ष्म अध्ययन और न्याय के प्रति अटूट समर्पण ने इस मामले को एक नई दिशा दी। अधिवक्ता रितु शर्मा ने यह साबित किया कि वकालत केवल पेशा नहीं, बल्कि न्याय के लिए संघर्ष का माध्यम भी है।
न्यायालय द्वारा जमानत स्वीकृत किए जाने के बाद परिवार की आंखों में राहत के आंसू दिखाई दिए। परिजनों का कहना है कि उन्हें विश्वास था कि सत्य और न्याय अंततः अपना मार्ग बना लेंगे।
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