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#mamakadhamakanews: गीत नाटिका लोक आस्था के नायक बुंदेला हरदौल पर चर्चा सम्पन्न

शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

/ by Vipin Shukla Mama
* लोक आस्थाओं और एतिहासिक तथ्यों में समन्वय बना कर रखना लेखक का दायित्व - रंगकर्मी ब्रजेश अग्निहोत्री
शिवपुरी, 24 जुलाई 2026। लोक आस्थाओं और एतिहासिक तथ्यों के मध्य किसी भी तरह की टकराहट से लेखक को बचना चाहिए, इनके मध्य समन्वय बना कर रखना प्रत्येक लेखक का दायित्व है। उपरोक्त विचार होटल जय माता पैलेस के कक्ष में अरुण अपेक्षित की कृति ‘‘गीत नाटिका लोक आस्था के नायक बुंदेला हरदौल‘‘ पर चर्चा करते हुए शिवपुरी नगर के प्रख्यात रंगकर्मी ब्रजेश भार्गव ने व्यक्त किए। उन्होंने इस नाटिका की प्रत्येक प्रस्तुति में जुझारसिंह की भूमिका अभिनीत की है। उल्लेखनीय है सन 1980 के दशक में इस नाटिका की लगातार चार से अधिक बार प्रस्तुतियां हुई थीं जो दर्शकों के द्वारा भरपूर सराही गई थी।
अभी हाल ही में जनवरी 2026 में प्रकाशित कृति ‘‘गीत नाटिका लोक आस्था के नायक बुंदेला हरदौल‘‘ पर चर्चा में संगोष्ठी के अध्यक्ष और अभिनेता ब्रजेश अग्निहोत्री, संगीतकार आत्मानंद, लेखक और कवि अरुण अपेक्षित, संयोजक और वनमाली सृजनपीठ शिवपुरी इकाई के अध्यक्ष और कार्यक्रम के संयोजक गोविंद अनुज, कुशल मंच संचालक गिरीश मिश्रा और हेमलता चौधरी ने सहभागिता की तथा समीक्षा बैठक का संचालन कवि श्री अखलाक खान ने किया।
चर्चा में सहभागिता करते हुए संगीतकार आत्मानंद शर्मा ने बताया कि इस नाटिका में संगीत देना उन्हें बहुत चुनोती पूर्ण रहा। इसमें अनेक बुंदेली लोक-गीत शैली के गीत हैं जिनकी मूल धुनों को उन्होंने अपनी स्वर्गीय मां से सीखा था और उन्हें उसी रूप में प्रस्तुत किया था। लेखक अरुण अपेक्षित ने अपनी हरदौल यात्रा के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि स्व.रामकुमार चतुर्वेदी चंचलजी की प्रेरणा से उन्होंने इस नाटिका की प्रथम प्रस्तुति के उपरांत एतिहासिक अन्वेषण का कार्य प्रारम्भ किया और इस नाटिका में उन तथ्यों की तलाश करने का प्रयास किया जिनके कारण दादी की आयु की भाभी को अपने पोते की उम्र के देवर के साथ चरित्र-हीनता के आरोपों में घिर कर विष देने के लिए विवश हो जाती है। जो आरोप एक सामान्य विवेक के व्यक्ति को भी निराधार प्रतीत हो सकते हैं वे आरोप एक महाराजा ने कैसे स्वीकार कर लिए, उसकी क्या विवशता थी-इसी विवशता की खोज को मैंने इस नाटिका में प्रकट किया है।  
संगोष्ठी के संयोजक गोविंद अनुज ने अपने सारगर्भित आलेख का वाचन करके इसके साहित्यिक स्वरूप की गम्भीरता से चर्चा की। इस चर्चा में गिरीश मिश्रा और हेमलता चौधरी, संचालन कर रहे अखलाक खान ने भी सहभागिता की और अपने विचार प्रकट किए। अंत में गोविंद अनुज के धन्यवादन ज्ञापन के साथ यह संगोष्ठी अपनी पूर्णता पर पहुंची।
















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