* दुनिया के बच्चों के बीच कार्तिक ने साझा की भारतीय संस्कृति और संस्कारों की पहचान
shivpuri शिवपुरी। उम्र महज 14 वर्ष, लेकिन हौसला ऐसा कि हजारों किलोमीटर दूर दूसरे देश की धरती पर भी आत्मविश्वास के साथ भारत का तिरंगा सीने से लगाए खड़ा रहा। शिवपुरी में गोविंद नगर निवासी बीजेपी नेता मुकेश सिंह चौहान के सुपुत्र कार्तिक देव सिंह चौहान ने अपनी प्रतिभा, संस्कारों और सीखने की ललक, आत्मविश्वास के दम पर न केवल अपने माता-पिता, बल्कि पूरे शिवपुरी और देश का गौरव बढ़ाया है। कार्तिक का चयन AFS (American Field Service) ग्लोबल STEM एकेडमी के अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम के लिए हुआ। यह ऐसा मंच है, जिसके माध्यम से विभिन्न देशों के विद्यार्थियों को एक-दूसरे की संस्कृति, शिक्षा, जीवनशैली और विचारों को समझने का अवसर मिलता है। कक्षा 10वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद कार्तिक ने चयन प्रक्रिया में हिस्सा लिया और अपनी प्रतिभा के दम पर भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए चयनित हुए।
माता-पिता ने जिगर के टुकड़े को अकेले दुनिया जानने भेजा
कार्तिक की इस उपलब्धि की सबसे प्रेरणादायी बात यह रही कि वह मिस्र (Egypt) की यात्रा पर अकेले गए। न उनके साथ परिवार का कोई सदस्य था और न कोई।शिक्षक। एक छोटे से शहर शिवपुरी का यह बालक हाथ में भारत का तिरंगा लेकर अकेले अंतरराष्ट्रीय सफर पर निकला और मिस्र की धरती पर पहुंचा। यह केवल एक विदेश यात्रा नहीं थी, बल्कि माता-पिता के विश्वास और बेटे के आत्मविश्वास की परीक्षा भी थी। माता-पिता ने अपने जिगर के टुकड़े को दुनिया देखने, नई संस्कृतियों को समझने और स्वयं के व्यक्तित्व को विकसित करने का अवसर दिया। कार्तिक ने भी इस विश्वास को सार्थक करते हुए पूरी जिम्मेदारी और आत्मविश्वास के साथ इस यात्रा को पूरा किया।
एयरपोर्ट पर तिरंगे के साथ खड़ा था शिवपुरी का लाल
मिस्र पहुंचने के बाद जब कार्तिक एयरपोर्ट पर भारत का तिरंगा सीने से लगाए खड़ा था, तो वहां मौजूद AFS के प्रतिनिधियों ने उसे पहचान लिया। अलग देश, अनजान लोग और बिल्कुल नया वातावरण होने के बावजूद कार्तिक के चेहरे पर आत्मविश्वास साफ दिखाई दे रहा था। कार्यक्रम में विभिन्न देशों से आए विद्यार्थियों के बीच कार्तिक ने भारतीय संस्कृति और परंपराओं को भी साझा किया। खेल और सांस्कृतिक गतिविधियों के दौरान उसने 'जय श्रीराम' के जयघोष के माध्यम से भारतीय आस्था और संस्कृति की अपनी पहचान भी प्रस्तुत की।
एकमात्र भारतीय, अलग भोजन व्यवस्था—संस्कारों की भी हुई पहचान
कार्यक्रम में कार्तिक अकेला भारतीय विद्यार्थी था। जहां अधिकांश विद्यार्थियों के लिए भोजन में मांसाहारी विकल्प सामान्य थे, वहीं कार्तिक के लिए उसकी शाकाहारी भोजन की आवश्यकता के अनुसार अलग व्यवस्था की गई। उसने अपनी खान-पान की परंपरा और संस्कारों से समझौता किए बिना अंतरराष्ट्रीय वातावरण में अपनी पहचान बनाए रखी।
विदेश जाकर समझा—भारतीय परिवार और रिश्तों की असली ताकत
इस यात्रा ने कार्तिक को केवल विदेश देखने का अवसर नहीं दिया, बल्कि जीवन की ऐसी सीख भी दी, जो किताबों में आसानी से नहीं मिलती। अलग-अलग देशों से आए विद्यार्थियों के साथ समय बिताते हुए उसने महसूस किया कि परिवार, माता-पिता, भाई-बहन, ताऊ-ताई और रिश्तों की आत्मीयता भारतीय सामाजिक जीवन की बड़ी विशेषता है। विभिन्न संस्कृतियों को करीब से देखने के बाद कार्तिक के मन में अपने देश, परिवार और भारतीय संस्कारों के प्रति सम्मान और भी गहरा हुआ।
जलवायु परिवर्तन पर सीखा, संवाद और नेतृत्व के गुर भी समझे
AFS ग्लोबल STEM एकेडमी में कार्तिक को जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण, विज्ञान, तकनीक और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे विषयों पर सीखने और विचार साझा करने का अवसर मिला। विभिन्न देशों के विद्यार्थियों के साथ संवाद करते हुए उसने जाना कि वैश्विक समस्याओं का समाधान केवल एक देश के प्रयासों से नहीं, बल्कि मिलकर काम करने से संभव है। इस अनुभव ने कार्तिक के भीतर सीखने की ललक, संवाद कौशल, आत्मनिर्भरता, नेतृत्व क्षमता और वैश्विक दृष्टिकोण को और मजबूत किया।
शिवपुरी जैसे छोटे से शहर से अंतरराष्ट्रीय मंच तक का सफर
कार्तिक की कहानी इस बात की मिसाल है कि बड़ी उड़ान के लिए उम्र नहीं, हौसला और संस्कार जरूरी होते हैं। शिवपुरी जैसे शहर से निकलकर अकेले मिस्र पहुंचना और वहां दुनिया के अलग-अलग देशों के विद्यार्थियों के बीच भारत का प्रतिनिधित्व करना निश्चित रूप से उसके लिए जीवनभर याद रहने वाला अनुभव बन गया है। कार्तिक ने इस यात्रा से जो सीखा, उसे अपने जीवन में आगे भी अपनाने का संकल्प लिया है। उसका लक्ष्य केवल स्वयं आगे बढ़ना नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति, पर्यावरण संरक्षण और जिम्मेदार नागरिकता के विचारों को दुनिया के सामने रखना भी है। कार्तिक की यह उपलब्धि उन माता-पिता के लिए भी प्रेरणा है, जो अपने बच्चों को केवल किताबों तक सीमित रखने के बजाय उन्हें दुनिया देखने, अनुभवों से सीखने और अपने पैरों पर खड़े होने का अवसर देते हैं। निश्चित ही मुकेश सिंह चौहान और उनके परिवार के लिए यह गर्व का क्षण है कि उनका 14 वर्षीय बेटा अकेले विदेश जाकर लौटा तो अपने साथ केवल यादें नहीं, बल्कि अनुभव, आत्मविश्वास और दुनिया को समझने की एक नई दृष्टि लेकर लौटा।











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