घटस्थापना (कलश स्थापना) के शुभ मुहूर्त
घटस्थापना सदैव प्रतिपदा तिथि और शुभ लग्न में की जाती है। चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग का त्याग शास्त्रसम्मत माना गया है।
* प्रातःकाल शुभ मुहूर्त: सूर्योदय के उपरांत द्वि-स्वभाव लग्न (कन्या लग्न) में कलश स्थापना अत्यंत प्रशस्त मानी जाती है।
* अभिजित मुहूर्त (सर्वश्रेष्ठ): दोपहर ११:४५ से १२:३५ के मध्य (यह किसी भी दिन बिना दोष का सर्वमान्य मुहूर्त होता है)।
प्रातः 07 : 11 से 12: 30 तक चल , लाभ, अमृत महूर्त शुभकाल है ।
दोपहर में 01:30 से 3 बजे शुभ काल है ।
घटस्थापना एवं पूजन सामग्री
वेदी एवं कलश हेतु: शुद्ध बालू/रेत, मिट्टी की वेदी, सात प्रकार के धान्य (सप्तधान्य: जौ, गेहूं, तिल आदि), तांबे या मिट्टी का कलश, आम या अशोक के पत्ते, मौली (कलावा), रोली, अक्षत, सुपारी, सिक्का, ढक्कन (पूर्णपात्र), साबुत चावल, पानी वाला नारियल और लाल वस्त्र।
पूजन सामग्री:-- गंगाजल, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल), लाल पुष्प, गुड़हल की माला, धूप, घी का अखंड दीपक, इत्र, लौंग, इलायची, कपूर, पान के पत्ते, मिष्ठान्न, ऋतुफल और श्रृंगार सामग्री (सिंदूर, बिंदी, चूड़ी, मेहंदी, चुनरी)।
प्रामाणिक पूजन विधि (क्रमवार)
पवित्रिकरण व संकल्प: पूजा स्थान को गंगाजल से पवित्र कर उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) में लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाएं। हाथ में जल, अक्षत व सिक्का लेकर नौ दिनों के व्रत व पूजन का संकल्प लें।
जौ बोना (सप्तधान्य वेदी): चौकी के पास मिट्टी की वेदी बनाकर उसमें सप्तधान्य और जौ बोएं।
कलश स्थापना:-- कलश पर स्वास्तिक बनाकर कलावा बांधें। उसमें जल, गंगाजल, सुपारी, सिक्का, हल्दी की गांठ व दुर्वा डालें। कलश के मुख पर आम/अशोक के पल्लव रखें, ऊपर चावल से भरी कटोरी (पूर्णपात्र) रखें और लाल वस्त्र लपेटकर नारियल स्थापित करें (नारियल का मुख साधक की ओर हो)।
अखंड ज्योति स्थापना: शुद्ध घी या तिल के तेल का अखंड दीपक आग्नेय कोण में प्रज्वलित करें।
षोडशोपचार पूजन: माँ भगवती का ध्यान कर आह्वान, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, पंचामृत स्नान, वस्त्र, उपवस्त्र, गंध (रोली-चंदन), अक्षत, पुष्प-माला, धूप, दीप, नैवेद्य (भोग), तांबूल (पान-सुपारी) एवं दक्षिणा अर्पित करें।
* पाठ एवं आरती: दुर्गा सप्तशती का पाठ या नर्वाण मंत्र (ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे) का जप करें। अंत में कपूर से आरती करें और क्षमा याचना करें।
नवदुर्गा: नौ तिथियों के विशेष भोग, मंत्र एवं फलदायी दान
| दिन | तिथि | देवी स्वरूप | विशेष प्रिय भोग | राशि अनुसार / अभीष्ट दान |
प्रथम तिथि प्रतिपदा ,माँ शैलपुत्री शुद्ध गाय का घी |,गौ सेवा हेतु चारा, घी या तांबे का पात्र
द्वितीय द्वितीया माँ ब्रह्मचारिणी शक्कर, मिश्री या पंचामृत सफेद वस्त्र, चांदी, शक्कर या विद्या दान
तृतीय तृतीया माँ चंद्रघंटा गाय के दूध की खीर या पेड़ा दूध, चावल, सफेद मिठाई या कांसी का बर्तन
चतुर्थ चतुर्थी |₹ माँ कुष्मांडा मालपुआ कुम्हड़ा (पेठा), हरी मूंग दाल या वस्त्र
पंचम पंचमी माँ स्कंदमाता केला या पीला फल पीला वस्त्र, चने की दाल या स्वर्ण/पीतल
षष्ठ षष्ठी माँ कात्यायनी शुद्ध मधु (शहद) शहद, लाल वस्त्र, गुड़ या अनार
सप्तम सप्तमी माँ कालरात्रि गुड़ या गुड़ से बनी मिठाई काले तिल, उड़द दाल, सरसों का तेल या लोहा
अष्टम अष्टमी माँ महागौरी नारियल या हलवा-चना कन्या भोजन, चुनरी, सुहाग सामग्री या चांदी
नवम नवमी माँ सिद्धिदात्री हलवा, पूड़ी, काले चने व खीर अन्नदान, नव कन्या पूजन एवं दक्षिणा
कन्या पूजन एवं पूर्णाहुति
कन्या पूजन: महाअष्टमी या महानवमी के दिन २ से १० वर्ष की नौ कन्याओं और एक बटुक (भैरव रूप) का पाद्य पूजन कर उन्हें हलवा, पूरी, चना और मौसमी फल का भोग लगाएं। दक्षिणा और उपहार देकर चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें।
हवन एवं पूर्णाहुति: नवमी तिथि पर नवग्रह, कुलदेवी और महामाया के निमित्त हवन कर पूर्णाहुति दें और कलश के पवित्र जल का पूरे भवन में छिड़काव करें।
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श्री मंशापूर्ण ज्योतिष केंद्र & शोध संस्थान
शिवपुरी (म.प्र.)











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