बिना पर्याप्त पार्किंग के चल रहे विवाह घर, नपा, पुलिस नोटिस तक सीमित
शिवपुरी शहर में संचालित लगभग 75 प्रतिशत मैरिज गार्डन ऐसे हैं, जहाँ पार्किंग के नाम पर एक इंच जमीन भी उपलब्ध नहीं है। शहर के रिहायशी इलाकों और मुख्य मागों पर स्थित ये गार्डन नियम-कायदों को ठेंगे पर रखकर संचालित हो रहे हैं। शासन के स्पष्ट निर्देश है कि किसी भी विवाह घर को नगर पालिका से विधिवत अनुमति लेना अनिवार्य है, लेकिन हकीकत यह है कि मुट्ठी भर गार्डनों को छोड़कर किसी के पास वैध अनुमति नहीं है। नगर पालिका प्रशासन अब तक इनकी जाँच-पड़ताल शुरू करने की हिम्मत भी नहीं जुटा सका है।
शहर में मैरिज गार्डनों की संख्या को लेकर भी नगर पालिका के आँकड़े सन्देह के घेरे में हैं। सरकारी कागजों में जो चिह्नित हैं, जिनसे सम्पत्ति कर वसूला जाता है। जबकि जमीनी हकीकत यह है कि शहर की गलियों और मुख्य मार्गों पर 150 से अधिक गार्डन धड़ल्ले से चल रहे हैं। बिना लाइसन्स और बिना सुरक्षा मानकों के चल रहे ये गार्डन न केवल राजस्व को चूना लगा रहे हैं, बल्कि शहर की सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा बन गए हैं। एडवांस बुकिंग का हवाला देकर अधिकारी अब इन पर ताला डालने से कतरा रहे हैं, जो उनकी कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खडे करता है।
शहर के कई मैरिज गार्डन तो पर्यावरण के लिए भी नासूर बन चुके हैं। कुछ गार्डन अपनी गंदगी और सीवर का कचरा सीधे जल स्रोतों या खुले नालों में बहा रहे हैं। रिहायशी इलाकों के बीच स्थित गार्डनों में देर रात तक बजने वाले डीजे और आतिशबाजी ने बुजुर्गों और बीमारों का जीना मुहाल कर रखा है लेकिन मजाल है कि नगर पालिका या प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड के कान पर जूं तक रेंग जाए! पिछले वर्ष भी प्रशासन ने' दिखावे' के लिए दो दर्जन गार्डनों को नोटिस थमाए थे। व्यवस्था सुधारने की चेतावनी दी गई थी, लेकिन नतीजा सिफर रहा। न पार्किंग बनी, न ही अग्निशमन यंत्र लगे। ऐसा लगता है कि प्रशासन की कार्रवाई केवल नोटिस भेजने और फाइलें भरने तक सीमित है। सीएमओ के निर्देश केवल अखबारों की सुर्खियों तक रह जाते हैं, जबकि घरातल पर जनता जाम में फँसकर अपनी किस्मत को कोसती रहती है। शहर की जनता अब सवाल पूछ रही है कि आखिर कब तक शिवपुरी के नागरिक मैरिज गार्डन संचालकों के मुनाफे की कीमत जाम में फॅसकर चुकाते रहेंगे।
इन 10 शर्तों की सरेआम उड़ रही धज्जियाँ
* पार्किंग का अभावः कुल क्षेत्रफल का 30% हिस्सा पार्किंग के लिए होना चाहिए, जबकि यहाँ गाड़ियों सड़क पर खड़ी होती है।
अवैध संचालनः बिना निकाय पंजीकरण के चल रहे गार्डन अवैध श्रेणी में हैं।
* दूरी का नियमः स्कूल-अस्पताल से 100 मीटर की दूरी का नियम कागजों में दफन है।
* बारात बीच सड़क पर चलती हैं जिससे जाम लगता है, टोकने पर विवाद होता है।
* बड़े बड़े डीजे इस साल करीब पांच न्यू बनकर तैयार हुए हैं उनसे भी सड़क पर जाम लगता है।
* ध्वनि प्रदूषणः रात 10 बजे के बाद भी कानफोडू संगीत जारी रहता है।
* प्लास्टिक पर कोई रोक नहींः प्रतिबन्धित थर्माकोल और प्लास्टिक का घडल्ले से उपयोग।
कचरा प्रबन्धनः कचरा सड़क पर या नालियों में फेंक दिया जाता है।
* आतिशबाजीः सड़क पर आतिशबाजी से राहगीरों की जान को खतरा बना रहता है।












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