* मामले में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता श्री राशिल गांधी (शिवपुरी निवासी) एवं श्री गुलशन राठौर ने पैरवी की
ग्वालियर। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कोई चेक उसकी वैधता अवधि समाप्त होने के बाद बैंक में प्रस्तुत किया जाता है और उसी कारण से वह अनादृत (डिशॉनर) हो जाता है, तो ऐसी स्थिति में परक्राम्य लिखत अधिनियम (Negotiable Instruments Act) की धारा 138 के अंतर्गत आपराधिक अपराध नहीं बनता।
मामले में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता श्री राशिल गांधी एवं श्री गुलशन राठौर द्वारा दायर याचिका में यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि विवादित चेक को उसकी वैधानिक वैधता अवधि समाप्त होने के बाद बैंक में प्रस्तुत किया गया था। बैंक द्वारा जारी रिटर्न मेमो में भी स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि चेक समय सीमा समाप्त होने के कारण अमान्य हो चुका था और इसी आधार पर उसे वापस किया गया।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क रखा गया कि धारा 138 के तहत अपराध स्थापित होने के लिए यह अनिवार्य है कि चेक को उसकी वैधता अवधि के भीतर ही बैंक में प्रस्तुत किया जाए। यदि चेक समय सीमा समाप्त होने के बाद प्रस्तुत किया जाता है, तो उस पर आधारित आपराधिक कार्यवाही कानूनन टिकाऊ नहीं होती। मामले में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता श्री राशिल गांधी एवं श्री गुलशन राठौर ने पैरवी की।
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पाया कि संबंधित चेक वास्तव में निर्धारित तीन माह की वैधता अवधि के बाद बैंक में प्रस्तुत किया गया था और बैंक ने इसी कारण से उसे अनादृत किया था। न्यायालय ने यह भी कहा कि धारा 138 एक दंडात्मक प्रावधान है, जिसकी व्याख्या सख्ती से की जानी चाहिए और इसे ऐसे मामलों में लागू नहीं किया जा सकता जहां चेक के अनादृत होने का कारण स्वयं शिकायतकर्ता की देरी हो।
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि जब चेक की वैधता अवधि समाप्त हो चुकी हो, तब वह विधि की दृष्टि में भुगतान योग्य परक्राम्य लिखत नहीं रहता और ऐसे में उसकी वापसी से धारा 138 के तहत कोई आपराधिक दायित्व उत्पन्न नहीं होता।
इन परिस्थितियों में न्यायालय ने निचली अदालत में लंबित आपराधिक शिकायत तथा उससे संबंधित समस्त कार्यवाही को कानूनी रूप से अवैध मानते हुए निरस्त (क्वैश) कर दिया।














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