बेटियों ने दूरी और समय की कमी का बहाना बनाते हुए परिजनों और संस्था से कहा, "आने में बहुत समय लग जाएगा, दूरी बहुत है। हम 5100 रुपये ऑनलाइन भेज रहे हैं, आप ही अंतिम संस्कार कर देना।"
मशीनी दौर में खत्म होती संवेदनाएं
जिस पिता ने अपनी जिंदगी की गाढ़ी कमाई लगाकर बेटियों को इस काबिल बनाया कि वे समाज में एक प्रतिष्ठित स्थान पा सकें, उसी पिता के अंतिम सफर में बेटियां शामिल नहीं हुईं। उन्होंने भौतिक जिम्मेदारियों और दूरी को अपने फर्ज से ऊपर रखा। संवेदनाओं के इस तरह खत्म होने और महज कुछ रुपयों में पिता की अंतिम क्रिया की औपचारिकता निपटाने की इस बात ने हर किसी का दिल तोड़ दिया है।
वीडियो कॉल पर अंतिम संस्कार और औपचारिकताएं
हैरानी की बात यह रही कि बेटियों ने खुद आने के बजाय फोन पर अंतिम संस्कार की लाइव वीडियो और फोटो भेजने की मांग की। जब पिता की अर्थी उठ रही थी, तब बेटियां मोबाइल की स्क्रीन पर औपचारिकताएं निभा रही थीं। वहां मौजूद लोगों की आंखें तब और नम हो गईं जब अंतिम समय में पिता के शव को कंधा देने के लिए उनके सगे संबंधी नहीं, बल्कि समाज के अनजान लोग और संस्था के कर्मचारी आगे आए। यह घटना हमें इस बात पर सोचने को मजबूर करती है कि क्या हम वाकई विकसित हो रहे हैं, या तकनीक और पैसों की होड़ में हमारी भावनाएं पूरी तरह मर चुकी हैं।
















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