नई दिल्ली। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने के प्रयास के दौरान हिरासत में लिए गए 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) के आशुतोष रांका और सौरव दास की न्यायिक हिरासत दो दिन के लिए और बढ़ा दी गई थी. हालाकि बुधवार को जमानत दे दी है है। इसके पहले इनके विषय में शिवपुरी निवासी सुप्रीम कोर्ट के युवा एडवोकेट निपुण सक्सेना ने इस पूरी क़ानूनी प्रक्रिया को लेकर अपनी राय दी।बोले, बीएनएसएस के अध्याय 9 के तहत निवारक यानी प्रिवेंटिव शक्तियों का हिस्सा बताते हैं.उन्होंने बीबीसी से कहा, "बीएनएसएस की धारा 126 से 143 तक एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को यह अधिकार है कि वह सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका पर किसी व्यक्ति से बॉन्ड भरवा सकता है. जब कोई व्यक्ति इस पीस बॉन्ड का उल्लंघन करता है, तो मजिस्ट्रेट धारा 130 के तहत जांच शुरू करता है." ज़मानतियों के ख़ारिज होने के मुद्दे पर उन्होंने कहा है कि बीएनएसएस की धारा 140 मजिस्ट्रेट को यह जांचने का अधिकार देती है कि ज़मानती योग्य है या नहीं. सक्सेना के मुताबिक, "ज़मानती वह व्यक्ति होता है जो अभियुक्त को पेश करने के लिए ज़िम्मेदार होता है. अगर ज़मानती अभियुक्त की बुनियादी जानकारी नहीं दे पाता, तो मजिस्ट्रेट उसे ख़ारिज कर सकता है." सक्सेना ने यह भी स्पष्ट किया कि सैद्धांतिक रूप से इन निवारक धाराओं के तहत किसी व्यक्ति को अधिकतम छह महीने तक हिरासत में रखा जा सकता है. हालांकि, वह सुप्रीम कोर्ट के पुराने फ़ैसलों का हवाला देते हुए कहा कि केवल ज़मानती न दे पाने को लंबे समय तक हिरासत में रखने का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।












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