shivpuri शिवपुरी। म.प्र. प्रगतिशील लेखक संघ और म.प्र. हिंदी साहित्य सम्मेलन की शिवपुरी इकाई ने महान कथाकार और उपन्यासकार प्रेमचंद की जयंती एक अलग ही अंदाज़ में मनाई। स्थानीय गांधी सेवाश्रम में 'दास्तान—ए—प्रेमचंद' के ज़रिए प्रेमचंद को याद किया और उन्हें अपनी श्रद्धांजलि व्यक्त की। कार्यक्रम की शुरुआत में लेखक ज़ाहिद ख़ान ने प्रेमंचद के पहले कहानी संग्रह 'सोज—ए—वतन' पर अपनी बात रखते हुए कहा, 'प्रेमचंद की यह पहली किताब थी, जो 1908 में प्रकाशित हुई। उस वक़्त वे नवाब राय के नाम से लिखते थे और हमीरपुर में शिक्षा विभाग में डिप्टी इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत थे। 'सोज—ए—वतन' प्रकाशित हुई, तो अंग्रेज़ हुकूमत ने इस किताब को राजद्रोह की श्रेणी में रख न सिर्फ़ इसे ज़ब्त कर लिया, बल्कि इसकी सारी कॉपियॉं भी जला दीं। जिला कलेक्टर ने उन्हें ताकीद की कि वे आइंदा जो भी लिखें, उसे प्रशासन को दिखा लें। लेकिन प्रेमचंद इस घटना से बिल्कुल विचलित नहीं हुए और वे अपना नाम बदलकर निरंतर साहित्य सृजन करते रहे। अपने साहित्य से उन्होंने देशवासियों को जागरूक करने के साथ—साथ अंग्रेज़ हुकूमत के ख़िलाफ़ संघर्ष के लिए उकसाया।
कार्यक्रम का अहम हिस्सा प्रेमचंद के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केन्द्रित एक दास्तान 'दास्तान—ए—प्रेमचंद' का वाचन था, जिसे शिवपुरी आकाशवाणी के उद्घोषक योगेन्द्र सिंह यादव और रूबी सिंह यादव ने पूरी नाटकीयता और अपनी आवाज़ के उतार—चढ़ाव से बेहद प्रभावी बना दिया। नाटककार राकेश वेदा की लिखी हुई इस दास्तान को श्रोताओं ने ख़ूब पसंद किया। दास्तान का आख़िरी अंश बेहद मार्मिक था। जिसमें प्रेमचंद के निधन के बाद के वातावरण का चित्रण है। जब दोनों दास्तान—गो ने इसका अपनी शानदार आवाज़ में चित्रण किया, तो गांधी सेवाश्रम तालियों से गूॅंज उठा। 'क्या वाक़ई कोई लेखक मरता है ? जिस आदमी ने होरी को आवाज़ दी, हामिद की हथेली में इंसानियत रखी, निर्मला के आँसू देखे, सूरदास की आँखों से अपनी सोसायटी को देखा—वह कैसे मर सकती है ? आज भी जब कोई किसान अपने हक़ के लिए खड़ा होता है—होरी की परछाईं दिखाई देती है। जब कोई बच्चा अपने छोटी—छोटी सहुलियतें और आराम को छोड़कर, किसी अपने की फ़िक्र करता है—हामिद मुस्कुराता है। जब कोई औरत अपने सम्मान के लिए आवाज़ उठाती है—निर्मला और धनिया की याद जागती है। जब कोई लेखक हुकूमत से सवाल करता है—प्रेमचन्द की क़लम उसके हाथ में आ जाती है।'
'दास्तान—ए—प्रेमचंद' के बाद प्रेमचंद को याद करते हुए समाजसेवी और गांधीवादी चिंतक श्रीप्रकाश शर्मा ने कहा, 'प्रेमचंद का दौर महात्मा गांधी का भी दौर था। गांधी जहॉं अपने राजनीतिक कर्म और आंदोलन से देशवासियों में चेतना जगा रहे थे, तो वहीं प्रेमचंद अपने लेखन के ज़रिए यही काम कर रहे थे।' म.प्र. हिंदी साहित्य सम्मेलन के जिला अध्यक्ष कवि—गीतकार विनय प्रकाश जैन 'नीरव' ने प्रेमचंद साहित्य की व्यापकता पर प्रकाश डालते हुए कहा, 'प्रेमचंद अकेले भारतीय साहित्यकार हैं, जिन्हें बच्चा—बच्चा जानता है। हम सब उन्हीं के साहित्य को पढ़कर बड़े हुए हैं। गॉंव, किसान और आम जन जीवन उनकी कहानियों और उपन्यासों में बार—बार लक्षित हुआ है। आम भाषा में लिखा उनका साहित्य हमें हमेशा संघर्ष के लिए प्रेरणा देता है।' कार्यक्रम में बड़ी संख्या में नगर के साहित्यकार एवं प्रबुद्ध और गणमान्य नागरिक मसलन महेन्द्र अग्रवाल, दिनेश वशिष्ट, रामबाबू पंडित, रामकृष्ण मोर्य, अख़लाक़ ख़ान, राजकुमार चौहान, अशोक सक्सेना, अरुण श्रीवास्तव, भगवान सिंह यादव, अशोक नीखरा, राकेश मिश्र रंजन, बसंत श्रीवास्तव, एम.एस. द्विवेदी, कल्पना सिनौरिया, वसीमा ख़ान, राजेन्द्र टेमक आदि उपस्थित थे। उनके प्रति आभार का प्रदर्शन म.प्र. हिंदी साहित्य सम्मेलन के सचिव सुनील व्यास ने किया।
















































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