चीख सुनकर दौड़े ग्रामीण, बची मासूम की जान
यह घटना मानवीय संवेदनाओं को झकझोरने वाली है, लेकिन साथ ही समाज में बची इंसानियत की गवाही भी देती है। आसमान से बरस रही तीखी धूप के बीच भूख से बिलखती मासूम की रोने की आवाज जब पास से गुजर रहे ग्रामीणों के कानों में पड़ी, तो उनके कदम ठहर गए। झाड़ियों को हटाकर जब लोगों ने उस नन्हीं जान को देखा, तो हर किसी की आँखें नम हो गईं। ग्रामीणों ने बिना देर किए पुलिस को सूचित किया जो मौके पर पहुंची फिर एक जवान ने तुरंत बच्ची को अपने सीने से लगाया, जिससे ममता की एक नई परिभाषा सामने आई।
अस्पताल में मिली नई जिंदगी
स्थानीय लोगों की सजगता के कारण तुरंत पुलिस और एम्बुलेंस को सूचित किया गया। मौके पर पहुँचे बचाव दल ने नवजात को तुरंत नजदीकी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) पहुँचाया। डॉक्टरों के अनुसार, समय पर इलाज मिलने के कारण बच्ची की स्थिति अब खतरे से बाहर और सुरक्षित है। अस्पताल का स्टाफ और स्थानीय महिलाएं अब उस मासूम की देखभाल में जुटी हैं।
लोग बोले, बेबसी या सामाजिक क्रूरता?
नौ महीने तक अपनी कोख में पालने के बाद एक माँ का अपनी ही संतान को इस तरह मौत के मुंह में छोड़ जाना कई गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या यह किसी माँ की अत्यधिक लाचारी और बेबसी थी, या फिर किसी सामाजिक लोक-लाज और कड़े दबाव का नतीजा? पुलिस ने इस मामले में अज्ञात माता-पिता के खिलाफ कानूनी धाराएं दर्ज कर ली हैं और मामले की बारीकी से जांच की जा रही है।













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