दो समय के बजाय सिर्फ एक समय लाते हैं दूध
बता दें कि शिवपुरी में दूधियों की मनमानी कोई नई बात नहीं है। शहर में दो समय (सुबह और शाम) दूध की सप्लाई सुनिश्चित करने के बजाय, ये दूधिए सिर्फ एक समय ही दूध लेकर आते हैं। अपनी इसी मनमर्जी के चलते ये जब चाहे तब हड़ताल पर चले जाते हैं और शहर की जनता को परेशान करते हैं। बार-बार बिना किसी ठोस वजह के हड़ताल पर चले जाना अब इनकी आदत बन चुका है। जबकि दीगर शहरों में दोनों समय दूध लाने की बात सामने आई है। एक समय दूध लाने से उसकी गुणवत्ता सवालों के घेरे में है।
मानसून में दाम बढ़ाने की मांग पूरी तरह बेमानी
जानकारों और आम नागरिकों का कहना है कि वर्तमान में मानसून का मौसम आ चुका है। इस सीजन में चारों तरफ पशुओं के लिए पर्याप्त मात्रा में हरा चारा मुफ्त या बेहद सस्ते दामों पर उपलब्ध रहता है। जब पशुओं के चारे की लागत कम हो जाती है, तो दूध उत्पादन का खर्च भी स्वतः ही घट जाता है। ऐसे अनुकूल समय में भी दूध के दाम बढ़ाने की जिद करना और हड़ताल की धमकी देना पूरी तरह से बेमानी और आम जनता की जेब पर डाका डालने जैसा है।
प्रशासन को अब अपनाना होगा कठोर रुख
शिवपुरी की जनता को दूध जैसी आवश्यक वस्तु के लिए बार-बार होने वाली इस ब्लैकमेलिंग से बचाने के लिए जिला कलेक्टर को इस बार बेहद कड़ा और कठोर रुख अपनाना होगा। प्रशासन को ऐसी ठोस और दीर्घकालिक रणनीति बनानी होगी जिससे इन दूधियों की मनमानी और बार-बार की हड़ताल से शहर को हमेशा के लिए निजात मिल सके। सांची दुग्ध संघ के माध्यम से वैकल्पिक व्यवस्था को मजबूत करना और आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत कार्रवाई करना अब समय की मांग बन चुका है।
स्थाई निदान के कुछ टिप्स
सहकारी डेयरी नेटवर्क का विस्तार (सांची व अन्य)
सरकारी कलेक्टिंग सेंटर:
शहर के प्रमुख चौराहों और वार्डों में 'सांची' या अन्य सरकारी सहकारी डेयरियों के कलेक्शन और वितरण केंद्र खोले जाएं।
सीधे किसानों से खरीद:
बिचौलियों या हड़ताली दूधियों पर निर्भरता कम करने के लिए प्रशासन सीधे उन ग्रामीण पशुपालकों से संपर्क करे जो हड़ताल का हिस्सा नहीं बनना चाहते।
दूध पार्लर की संख्या बढ़ाना:
शहर में पैकेज्ड दूध की उपलब्धता को दोगुना किया जाए ताकि आम जनता को खुले दूध की कमी महसूस न हो।
आवश्यक सेवा अनुरक्षण कानून (एस्मा / ESMA) का प्रयोग
दूध को आवश्यक सेवा घोषित करना: दूध बच्चों और मरीजों के लिए एक अनिवार्य वस्तु है। प्रशासन इस व्यवस्था को 'आवश्यक सेवा' के दायरे में लाकर हड़ताल को प्रतिबंधित कर सकता है।
कड़े कानूनी कदम:
बिना पूर्व सूचना या गैर-कानूनी तरीके से आवश्यक आपूर्ति बाधित करने वाले दूधियों के लाइसेंस बनाने और लिस्टिंग करने के बाद निरस्त किए जाएं।
मूल्य निर्धारण और गुणवत्ता की सख्त निगरानी
त्रिस्तरीय कमेटी का गठन:
कलेक्टर की अध्यक्षता में एक कमेटी बने जिसमें दुग्ध उत्पादक, डेयरी संचालक और उपभोक्ता फोरम के प्रतिनिधि शामिल हों। यह कमेटी हर सीजन (जैसे मानसून, गर्मी) के आधार पर दूध के दाम तय करे।
फैट के आधार पर भुगतान:
मनमाने दाम वसूलने के बजाय दूध की शुद्धता और फैट (Fat/SNF) के आधार पर दाम फिक्स किए जाएं। मिलावट करने वालों पर सख्त कार्रवाई हो।
बाहरी जिलों या समितियों से बैकअप सप्लाई
आपातकालीन आपूर्ति:
15 दिन की हड़ताल की धमकी से निपटने के लिए ग्वालियर, गुना या नजदीकी दुग्ध संघों से शिवपुरी शहर के लिए अतिरिक्त दूध टैंकरों की व्यवस्था पहले से आरक्षित की जाए।
बफर स्टॉक:
निजी और सरकारी डेयरियों को अगले 15 दिनों के लिए मिल्क पाउडर और टेट्रा-पैक दूध का बफर स्टॉक रखने के निर्देश दिए जाएं।
दूधियों का अनिवार्य पंजीकरण और रूट मैपिंग
पंजीकरण अनिवार्य:
शहर में दूध सप्लाई करने वाले हर दूधिया (हॉकर) का प्रशासन के पास अनिवार्य रजिस्ट्रेशन होना चाहिए।
अचानक हड़ताल पर जुर्माना:
बिना 30 दिन के एडवांस नोटिस के सप्लाई रोकने पर भारी जुर्माने या शहर में प्रवेश पर प्रतिबंध का नियम बनाया जाए।इन कदमों से न केवल दूधियों की मनमर्जी पर लगाम लगेगी, बल्कि शिवपुरी के नागरिकों को सालभर सही दाम पर शुद्ध दूध की निर्बाध आपूर्ति भी सुनिश्चित होगी।
















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