दोस्तों कल 05 जुलाई 2026 रविवार को छत्तीसगढ़ की प्रमुख पंडवानी गायिका श्रीमती तीजन बाई का निधन हो गया। उन्हें मामा का धमाका डॉट कॉम शिवपुरी की तरफ से श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। साथ ही उनके व्यक्तित्व को करीब से देखने वाले जानेमाने कलाकार साहित्यकार और लेखक अरुण अपेक्षित जी से उनके बारे में जानते हैं। अरुण जी कहते है कि सबसे पहले मैंने उन्हें सन 1984 में रायगढ़ लोकोत्सव में देखा और सुना था। तब वे राष्ट्रीय अथवा अंतर-राष्ट्रीय ख्याति की कलाकार नहीं थी। इस लिए उसी रेलवे स्टेशन के निकट धर्मशाला में ठहरी थीं जहां प्रदेश भर के तमाम कलाकार ठहराये गए थे। यह वह समय था जब मध्य प्रदेश का विभाजन नहीं हुआ था और तब हम भी शासकीय कलापथक के नये-नये कलाकार थे और तमाम मध्य-प्रदेश के लोक-गीतों, नृत्यों तथा नाट्य शैलियों से परिचित हो रहे थे। हम इस लोकोत्सव में हमारे ग्वालियर क्षेत्र का कांवर-नृत्य लेकर गए थे। सच्चाई यह है कि इस लोेकोत्सव में हम मध्य-प्रदेश के अन्य क्षेत्रों के साथ छत्तीगढ़ी कलाकार ही नहीं उनकी ललित-कलाओं का भी प्रथम प्रत्यक्ष अवलोकन कर रहे थे। छत्तीसगढ़ी का नाचा, करमा और पंथी नृत्य, छत्तीसगढ़ी लोक-गीत और पंडवानी की प्रस्तुति का प्रथम दर्शन और अवलोकन। निश्चित ही उसी समय इस अद्भुत कलाकार ने हमें हम सब को बहुत प्रभावित किया।
रायगढ़ उस समय नकसली घटनाओं की चपेट में था। हम सारे कलाकारों को कठोरता के साथ समझा दिया गया था कि कोई शाम के बाहर कहीं नहीं जायेगा। सभी अपनी धर्मशाला में रहेंगें। तीन दिवसीय लोकोत्सव जिस विशाल मैदान में आयोजित था वहां प्रदेश भर के 300-400 कलाकार दोपहर दो बजे के आसपास पहुंच जाते थे। तीन बजे से कार्यक्रम प्रारम्भ होता और छै बजते-बजते कार्यक्रम अपनी पूर्णता पर पहुंच जाता। स्वाभाविक है-सारे कलाकार अपनी-अपनी प्रस्तुतियां देने के उपरांत अपना अधिकांश समय उसी धर्मशाला में व्यतीत करते थे। इससे आपस में मिलने-जुलने का, मित्रता करने का अधिक से अधिक समय सभी कलाकारों को मिल जाता था। दूसरे इस धर्मशाला में अलग-अलग कमरे नहीं थे- बड़े-बड़े कक्ष थे जिनके दोनों ओर गद्दे बिछा दिए गए थे, सारे कलाकार इन्हीं गद्दों पर विश्राम करते थे। सभी को अपना निजी सामान भी अपने सिरहाने रखना होता था। एक बड़े से कक्ष में कम से कम सौ कलाकार तो होते ही थे। जब खाली समय होता तो सब अपना-अपना रियाज भी करते थे, जो रियाज नहीं कर रहे होते थे वे श्रोता बन जाते थे। तब मध्य-प्रदेश अखंड था इस लिए सम्पूर्ण अखंड-मध्यप्रदेश के ढेर सारे लोक कलाकार यहां एकत्रित थे। मैं और मेरे कलापथक के साथी चूंकि पहली बार इतने बड़े आयोजन में शामिल हो रहे थे तो हमारे लिए यह एक अलगसा अनुभव था। आज हम इस बात पर गर्व कर सकते हैं कि हमने तीजनबाई जैसे महान कलाकार के साथ एक ही टाट-पट्टी पर बैठ कर भोजन किया है। बाद में तीजनबाई से दुर्ग, विलासपुर, डोंगरगढ़ में आयोजित लोकोत्सवों में भी भेंट हुई। उनसे अंतिम भेंट शिवपुरी में ही हुई। आकाशवाणी शिवपुरी ने यहां एक लोकोत्सव का आयोजन किया था। प्रमुख मंचीय आयोजन के अतरिक्त एक परिवारिक बैठक का भी आयोजन हमने किया था जिसमें तीजन बाई अपने सम्पूर्ण दल के साथ पधारी थीं। निश्चित ही उनका सानिध्य बहुत ही सहज और साधरण था। कभी लगा ही नहीं कि हम किसी विश्व-विख्यात कलाकार से मिल रहे हैं। जब वे शिवपुरी आई थीं तब उन्हें पद्मश्री मिल चुका था। बाद में उन्हें पद्म-भूषण से भी अलंकृत किया गया। मैं मेरे देश की इतनी महान मगर सहज-साधरण, अपनी मिट्टी की कलाकार डॉ.श्रीमती तीजन बाई को अपनी विनम्र श्रृधांजली अर्पित करता हूं। अरुण अपेक्षित 06 जुलाई 2026 इंदौर मध्य-प्रदेश।
















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